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17.08.2024 (DarbhangaOnline) (दरभंगा) (मणिकांत झा) : ठोहि पारिकय कानि रहल आइ भारत के सिया धिया, इज्जति आबरू तार तार छै मिझा रहल प्राणक दीया।

शक्ति उपासना केर धरती पर भ रहलय शक्तिक अपमान, दानव दल पुनि पिनगी छोड़ल झीकि रहल ललना केर जान।

बेटी बचबी बेटी पढ़बी जेहि देशक सुनलहुँ नारा, ताहि देश मे राक्षस खूनय बेटी केर अँचिया सारा।

कन्या आइ नहि रहल सुरक्षित ने बाँचल ओकर सम्मान, अपनहि घर लागय मरघटिया धुक धुक करय सदिखन प्राण।

भारती गार्गी मैत्रेयी तारा लक्ष्मी सरस्वती दुर्गाक स्वरुप, अपटी खेत मे मरि रहली धृतराष्ट्र सनक छै बैसल भूप।

हमर सभ्यता आ संस्कृतिक दिन दिन भ’ रहलैक क्षरण, पाश्चात्यक फेरी मे परिकय अपन गुमानक चीर हरण।

जागू जागू हे काली तारा कतय नुकायल स्वाभिमान, काता खप्पर हाथ मे लीय बचबू अप्पन मान सम्मान।

अरि के मटियामेट करु आ छोपू शिर दुहशासन के, महिमा अहाँ देखाकय अपन डोला दियौ पुनि शासन के।

बेटी प्रकृतिक प्रतीक थिक एकरा बिनु छथि बौन पुरुष, घर घर सँ बहराउ सड़क पर नारा धरना और जुलूस।

अन्यायक मर्दन हो सगरे मर्यादा केर होबय पालन, मणिकांत अहाँक संग चलय छथि करब नहि मौनक धारण।