February 27, 2023

23.02.2023 (दरभंगा) : इंटरनल मेडिसिन विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ० ए० के० गुप्ता ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को उद्देश्य अथवा लक्ष्य तक पहुंचाने में एकाग्रता की अहम भूमिका है। दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल के स्थापना दिवस के अवसर पर "एकाग्रता की शक्ति को कैसे विकसित करें" विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित करते हुए दरभंगा मेडिकल कॉलेज के इंटरनल मेडिसिन विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ० ए० के० गुप्ता ने एकाग्रता के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आम समझ है कि केवल छात्रों को ही जीवन में सफल होने के लिए एकाग्रता की जरूरत है। वास्तव में ऐसा नहीं है। छात्रों के अलावा प्रायः हर पेशे के लोगों चाहे वे डॉक्टर हों, इंजीनियर हों, वकील हों, वैज्ञानिक हो या ड्राइवर हों, सबों को इसकी आवश्यकता है।
उन्हें उनके उद्देश्य अथवा लक्ष्य तक पहुंचाने में एकाग्रता की अहम भूमिका है। वास्तव में देखा जाए तो दुनिया में जितने भी महत्वपूर्ण अनुसंधान हुए हैं उन सब के पीछे वैज्ञानिकों की एकाग्रता ही मुख्य कारण रही है। उन्होंने अपने संबोधन में एकाग्रता प्राप्त करने की जरूरत क्यों है, एकाग्रता विकसित करने में कौन-कौन सी बाधाएं अथवा चुनौतियां सामने आती हैं और इन चुनौतियों से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है – इस बात का बखूबी उल्लेख किया। स्वामी विवेकानंद के हवाले से डॉ० गुप्ता ने कहा कि जीवन में सफलता और असफलता एकाग्रता का ही परिणाम है। जो व्यक्ति जीवन में जितना एकाग्र होता है उसे सफलता उतनी ही ज्यादा मिलती हैं।
अपेक्षाकृत कम एकाग्रता वाले लोगों को जीवन में वांछित सफलता नहीं मिल पाती हैं। हमारे जीवन में जिस ढंग से भोजन और ऑक्सीजन की जरूरत होती है ठीक उसी तरह एकाग्रता को विकसित करना भी उतना ही जरूरी होता है। एकाग्रता की परिभाषा देते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति के अंदर किसी वस्तु, विषय या विचार पर केंद्रित करने की क्षमता को ही एकाग्रता कहते हैं। इससे थोड़ा इतर स्वामी विवेकानंद का कहना था कि यह योग्यता विकसित करना एक अलग चीज है लेकिन इसके साथ साथ जीवन में नकारात्मकता से अपने आप को अलग करना भी एकाग्रता का ही हिस्सा है। जब कोई व्यक्ति अपने उद्देश्यों के प्रति सकारात्मक सोच और जीवन की गलत आदतों से दूरी बनाने में सफल हो जाता है तब जाकर वह मुकम्मल एकाग्रता की स्थिति को प्राप्त करता है।
उन्होंने कहा कि एकाग्रता विकसित करने में आज के समय में सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग सबसे ज्यादा बाधक है। इसके अलावा एक साथ कई काम करने की प्रवृत्ति भी एकाग्रता के लिए चुनौती है। आज के सामाजिक परिवेश में व्यक्ति एक ही साथ टीवी भी देखता है, खाना भी खाता है और कभी-कभी पढ़ाई भी करता रहता है। यह सही नहीं है। ऐसे में एकाग्रता प्राप्त करना संभव नहीं है। इसलिए एक समय में एक ही काम को करना श्रेयस्कर है। इसके अलावा अल्कोहल का इस्तेमाल और वांछित से कम नींद भी एकाग्रता स्थापित करने में बाधक है। भूखे रहने की स्थिति अथवा कभी किसी दुर्घटना या मारपीट में सिर में जख्म होने की स्थिति भी एकाग्रचित्त होने में बाधक हैं। बच्चों में अटेंशन डिफिसिट हाइपर एक्टिविटी नामक रोग भी उन्हें एकाग्र नहीं होने देता। डिप्रेशन, डिमेंशिया अथवा इकलेप्सी से पीड़ित लोगों को भी एकाग्रचित्त होने में परेशानी होती है।
मानसिक बीमारी जैसे साइजोंफ्रेनिया अथवा बाइपोलर डिसऑर्डर भी इसका एक कारण है। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या काफी कम है। ऐसे में निष्कर्ष निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि जीवन में तीन चीजें – सोशल मीडिया, अल्कोहल और बिखराव युक्त जीवन शैली एकाग्रता विकसित करने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधक हैं। एकाग्रता की शक्ति को विकसित करने के विभिन्न उपायों की चर्चा करते हुए डॉ. गुप्ता ने कहा कि एक बार जब स्वामी विवेकानंद से पूछा गया कि एकाग्रता की शक्ति को कैसे विकसित करें तो उन्होंने कहा था – शक्तिशाली बनो और संघर्ष करो। उनके इस वाक्य में एकाग्रता को प्राप्त करने के लिए जरूरी तमाम तथ्य छिपे हुए हैं। शक्तिशाली बनने से स्वामी विवेकानंद का अभिप्राय था – शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति और आध्यात्मिक शक्ति का विकास। इसी तरह संघर्ष से उनका अभिप्राय था कि आपके अंदर जो बुराइयां हैं उनको दूर करने के लिए आप संघर्ष करें तो एकाग्रता को निश्चित रूप से प्राप्त कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन में नकारात्मकता को आप जैसे - जैसे समाप्त करते जाएंगे उसी अनुपात में आपकी एकाग्रता की शक्ति बढ़ती चली जाएगी। सोशल मीडिया का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग 8 से 10 घंटे मोबाइल पर बिताते हैं। हालांकि इस बात से नकारा नहीं जा सकता कि सोशल मीडिया से हमें देश दुनिया की अद्यतन जानकारी मिलती है। लोगों से विचारों का आदान-प्रदान भी होता है। अनुसंधान की भी बात होती है। लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल कहीं से भी वाजिब नहीं है। सोशल मीडिया वास्तव में दोधारी तलवार है।
जीवन में इसे खत्म तो नहीं किया जा सकता लेकिन इसके उपयोग की सीमाएं तय की जा सकती हैं। एकाग्रता को विकसित करने में शरीर का स्वस्थ होना भी जरूरी है। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ आत्मा का वास होता है। प्रायः देखा गया है कि हरी हरी सब्जियों, फल और मैग्नीशियम का प्रचुर मात्रा में सेवन करने से एकाग्रता की स्थिति बढ़ती है। उन्होंने कहा कि बदलती जीवन शैली कई तरह की परेशानियां पैदा कर रही हैं। इसलिए लोगों को इसमें बदलाव लाना चाहिए। आज युवा वर्ग में देर रात तक सोना और फिर सुबह में देर से उठना एक फैशन बनता जा रहा है। इसे रोकना होगा।
बेहतर यह होगा कि वे रात में 10 बजे के लगभग में सो जाएं और सुबह 4 से 5 के बीच में उठकर प्रकृति के करीब पहुंचने का काम करें। पढ़ाई लिखाई के लिए भी अहले सुबह का समय सर्वोत्तम है। ऑफिस में लगातार सात-आठ घंटे कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले लोगों के लिए उन्होंने सलाह दी कि वह हर एक घंटे पर 5-10 मिनट के लिए काम को ब्रेक दें। इस ब्रेक के दौरान वे या तो कार्यालय में ही या लौंन में टहल कर अपनी एकाग्रता को विकसित कर सकते हैं। ऐसे लोग 5 से 10 मिनट का मेडिटेशन भी कार्यालय के अंदर ही कर वे तरोताजा हो सकते हैं। इससे उनके एकाग्रता के स्तर में काफी वृद्धि हो सकती है।